
मृत हितग्राही के आवास में समान नाम का खेल? कागज सामने, फिर भी कार्रवाई का इंतजार—जांच पर उठे गंभीर सवाल किस नकाबपोश का है संरक्षण
आमागोहन-खोंगसरा में आवास योजना की प्रक्रिया पर सवाल, ग्रामीणों का आरोप—दस्तावेज स्पष्ट होने के बावजूद जांच को लंबा खींचा जा रहा; आखिर कार्रवाई से किसका डर?


जीशान अंसारी की कलम से

खोंगसरा/आमागोहन।प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण में अनियमितता के आरोपों को लेकर आमागोहन क्षेत्र एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला सिर्फ आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हितग्राही की जानकारी, स्थल निरीक्षण, जिओ टैगिंग और बाद में की गई आवास संबंधी कार्रवाई को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आ रहे हैं।


मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति के नाम पर प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ स्वीकृत था, उसकी मृत्यु के बाद उसके आश्रित परिवार के स्थल का निरीक्षण और जिओ टैग किया गया, तो बाद में समान नाम वाले दूसरे व्यक्ति को लाभ कैसे मिला?

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार सुखदास पिता तिलकदास के नाम प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण से संबंधित रिकॉर्ड दर्ज है। योजना के दस्तावेज में हितग्राही का नाम SUKHDAS और PMAY-G आईडी CH2073335 दर्ज दिखाई देती है। वहीं उपलब्ध रिकॉर्ड में स्थल निरीक्षण, प्लिंथ तथा अन्य चरणों से संबंधित प्रविष्टियां भी दिखाई देती हैं।
जिला पंचायत को शिकायत मिली तो जांच के लिए बाकायदा आदेश जारी
इस मामले को लेकर जनपद पंचायत कोटा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी कार्यालय से 09 सितंबर 2026 को आदेश जारी किया गया। आदेश में CM हेल्पलाइन 1076 की शिकायत क्रमांक WP260900174840 एवं WP26080131546 का उल्लेख है।
आदेश में ग्राम पंचायत आमागोहन में प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण से संबंधित अनियमितता की शिकायत की जांच के लिए अधिकारियों/कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है और जांच प्रतिवेदन दो दिवस के भीतर कार्यालय में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
यानी मामला इतना गंभीर माना गया कि जांच के लिए बाकायदा लिखित आदेश जारी करना पड़ा।
लेकिन अब सवाल यह है कि जब जांच के लिए दो दिन की समय-सीमा निर्धारित की गई थी, तो जांच का अंतिम निष्कर्ष और जिम्मेदारों पर कार्रवाई अब तक कहां तक पहुंची?
कागजों में हितग्राही का नाम, स्थल पर दूसरा सवाल
उपलब्ध आवास रिकॉर्ड में सुखदास का नाम और PMAY-G आईडी दर्ज है। रिकॉर्ड में आवास से जुड़े भुगतान एवं निरीक्षण की प्रविष्टियां भी दिखाई देती हैं।
दूसरी ओर शिकायत से जुड़े तथ्यों में यह आरोप सामने आया है कि मूल हितग्राही की मृत्यु के बाद उसके आश्रित परिवार की बहू इंद्रा पति गरीब दास के स्थल का निरीक्षण किया गया तथा जिओ टैगिंग की गई।
यहीं से पूरा मामला गंभीर हो जाता है।
यदि वास्तव में आश्रित परिवार के स्थल का निरीक्षण और जिओ टैग किया गया था, तो—
बाद में आवास का लाभ किसके नाम पर आगे बढ़ा?
राशि किस बैंक खाते में भेजी गई?
पोर्टल पर दर्ज हितग्राही और वास्तविक निर्माण स्थल का मिलान किसने किया?
समान नाम वाले व्यक्तियों की पहचान किस दस्तावेज के आधार पर की गई?
क्या आधार, बैंक खाता, परिवार की जानकारी और वास्तविक निवास स्थल का सत्यापन किया गया?
मृत्यु के बाद मूल हितग्राही के मामले में विभागीय प्रक्रिया क्या अपनाई गई?
इन सवालों का जवाब मौखिक जांच से नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड और मौके के भौतिक सत्यापन से सामने आना चाहिए।
समान नाम बना सबसे बड़ा सवाल
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि मूल हितग्राही सुखदास पिता तिलकदास के नाम से मिलता-जुलता/समान नाम होने का फायदा उठाकर दूसरे व्यक्ति को आवास का लाभ दिलाया गया।
यह आरोप सही है या नहीं, इसका निर्णय जांच के बाद ही हो सकता है। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर दोनों व्यक्तियों की पहचान, पिता का नाम, बैंक खाता, आधार संबंधी विवरण, PMAY-G आईडी और निर्माण स्थल का मिलान करना बेहद जरूरी है।
यदि रिकॉर्ड में अंतर पाया जाता है तो जिम्मेदारी तय करना भी आवश्यक होगा।
जांच अधिकारी क्या जांच रहे हैं, यह भी सार्वजनिक होना चाहिए
ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र में आवास योजना से जुड़े मामलों की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब किसी मामले में दस्तावेज, पोर्टल रिकॉर्ड, जिओ टैग और स्थल निरीक्षण जैसी चीजें मौजूद हैं, तब जांच को अनिश्चित समय तक लंबित रखने के बजाय स्पष्ट निष्कर्ष सामने आना चाहिए।
ग्रामीणों द्वारा कुछ जिम्मेदार लोगों की भूमिका और कथित संरक्षण को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, इसलिए इनकी सत्यता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
लेकिन प्रशासन के सामने एक सीधा सवाल जरूर है—
अगर सब कुछ नियम के अनुसार है तो जांच में देरी क्यों? और अगर रिकॉर्ड में गड़बड़ी है तो कार्रवाई कब?
किसके दबाव में मामला दबने का आरोप?
ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी है कि मामले को कथित रूप से प्रभावशाली लोगों अथवा बिचौलियों के संरक्षण में दबाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, किसी नेता, अधिकारी या व्यक्ति की मिलीभगत का कोई निष्कर्ष बिना जांच के नहीं निकाला जा सकता।
इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन स्वयं स्पष्ट करे—
कौन अधिकारी जांच कर रहा है?
जांच कब पूरी हुई?
जांच में क्या तथ्य सामने आए?
किसके खाते में राशि गई?
किसके नाम आवास स्वीकृत था?
किस स्थल का जिओ टैग हुआ?
और वर्तमान में निर्माण किस व्यक्ति के लिए किया जा रहा है?
दस्तावेजों की क्रॉस-वेरिफिकेशन से खुल सकता है पूरा सच
इस मामले में निष्पक्ष जांच के लिए निम्न रिकॉर्ड का मिलान जरूरी है—
मूल PMAY-G स्वीकृति आदेश।
PMAY-G आईडी CH2073335 से जुड़ा पूरा रिकॉर्ड।
हितग्राही सुखदास पिता तिलकदास की पहचान एवं मृत्यु से संबंधित दस्तावेज।
आश्रित परिवार के दस्तावेज।
इंद्रा पति गरीब दास के स्थल निरीक्षण एवं जिओ टैग का रिकॉर्ड।
आवास पोर्टल पर दर्ज सभी फोटो एवं जिओ लोकेशन।
बैंक खाता एवं FTO/भुगतान रिकॉर्ड।
निर्माण स्थल का वर्तमान भौतिक सत्यापन।
संबंधित आवास मित्र एवं तकनीकी अमले की रिपोर्ट।
समान नाम वाले व्यक्ति के दस्तावेज और वास्तविक निवास स्थल का मिलान।
इन सभी दस्तावेजों का एक साथ मिलान होने के बाद ही यह साफ हो सकेगा कि आवास किसके नाम स्वीकृत हुआ, किसका स्थल सत्यापित हुआ और वास्तविक भुगतान/निर्माण किसके पक्ष में हुआ।
अब सवाल सिर्फ जांच का नहीं, कार्रवाई का है
जनपद पंचायत कोटा द्वारा जांच के लिए आदेश जारी किए जाने के बावजूद यदि मामला लंबे समय तक केवल “जांच चल रही है” तक सीमित रहता है, तो इससे शिकायतकर्ता और ग्रामीणों के बीच स्वाभाविक रूप से सवाल उठना तय है।
यदि जांच में कोई अनियमितता नहीं मिली तो प्रशासन को स्पष्ट रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। और यदि दस्तावेजों एवं भौतिक सत्यापन में नियम विरुद्ध कार्रवाई सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई और पात्र परिवार के अधिकार की बहाली की जानी चाहिए।
क्योंकि सवाल किसी एक आवास का ही नहीं है—सवाल यह है कि गरीब परिवारों के लिए बनाई गई सरकारी योजना में कागज, जिओ टैग और बैंक भुगतान के बावजूद यदि हितग्राही की पहचान ही बदल जाए, तो जवाबदेही किसकी होगी?
अब देखना होगा कि जिला पंचायत और जनपद पंचायत के अधिकारी इस मामले में सिर्फ जांच का हवाला देते हैं या उपलब्ध दस्तावेजों का मिलान कर स्पष्ट निष्कर्ष और जिम्मेदारी भी तय करते हैं।















